Panthera tigris tigris
विंध्य की परंपरा और संस्कारों का संवर्धन
हम लोक कला, लोकगीत, नृत्य, साहित्य, भाषा, संस्कार और सामाजिक मूल्यों को प्रोत्साहन देते हुए समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं। मंच समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम, कला कार्यशाला, प्रतिभा मंच, समाजसेवा गतिविधियाँ और युवा जागरूकता अभियानों के माध्यम से समाज को संस्कारित और प्रेरित करता है।
विंध्य सांस्कृतिक मंच विंध्य क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित व संवर्धित करने के लिए समर्पित संगठन है। हमारा उद्देश्य केवल गौरवशाली इतिहास को याद करना नहीं, बल्कि उसे जीना, अपनाना और नई पीढ़ी तक पहुँचाना है।

हम विंध्य क्षेत्र की गौरवशाली परंपराओं, जीवन-मूल्यों और सांस्कृतिक ethos को आगे बढ़ाने के लिए कार्यरत हैं।
क्षेत्रीय लोक कला, लोकगीत, नृत्य और सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजकर उन्हें मंच प्रदान करना हमारा ध्येय है।
विंध्य क्षेत्र की लोक-संस्कृति का संरक्षण और प्रचार
स्थानीय कलाकारों को मंच प्रदान करना
युवा पीढ़ी में सांस्कृतिक जागरूकता विकसित करना
सांस्कृतिक एवं खेल गतिविधियों का आयोजन
सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समरसता को मजबूत करना

विंध्य की संस्कृति हमारी पहचान है। इसे सहेजना, संवारना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना ही विंध्य सांस्कृतिक मंच का संकल्प है। (अध्यक्ष, विंध्य सांस्कृतिक मंच)

“संस्कृति केवल परंपरा नहीं, यह समाज को जोड़ने वाली शक्ति है। विंध्य सांस्कृतिक मंच इसी शक्ति को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास है।” (उपाध्यक्ष, विंध्य सांस्कृतिक मंच )

अनुशासन, समर्पण और संस्कृति— यही किसी समाज की असली शक्ति है। विंध्य सांस्कृतिक मंच इन मूल्यों के साथ क्षेत्र की पहचान को सशक्त बना रहा है। (उपाध्यक्ष, विंध्य सांस्कृतिक मंच)

संगठन की मजबूती विचार, कार्य और संस्कारों से बनती है। विंध्य सांस्कृतिक मंच इन्हीं मूल्यों के साथ संस्कृति को व्यवस्थित और सतत रूप से आगे बढ़ा रहा है। (सचिव, विंध्य सांस्कृतिक मंच)
विंध्य के वीर, राष्ट्र के गौरव
भारत के थल सेनाध्यक्ष
भारत नौसेना के 26वें सीएसएन
विंध्य क्षेत्र की कला-प्रकृति एवं पुरातत्व
विंध्य क्षेत्र भारतीय संस्कृति का प्राचीन, गौरवशाली और अद्भुत धरोहर-स्थल है। यह धरती केवल प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण नहीं, बल्कि यहाँ की अनूठी कला-परंपराएँ, लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक स्मारक इसे विशेष पहचान प्रदान करते हैं। यहाँ की नदियाँ, जलप्रपात, पर्वत-श्रृंखलाएँ, घने वन और वन्य-जीवन प्रकृति की दिव्यता को दर्शाते हैं, वहीं लोक-कला, लोक-गीत, नृत्य, हस्तशिल्प एवं प्राचीन स्थापत्य पुरातन संस्कृति की गरिमा का परिचय देते हैं। विंध्य की यह धरा सदियों से ऋषि-मुनियों, संतों, योद्धाओं और महान विभूतियों की कर्मभूमि रही है। यहाँ की कला और प्रकृति मिलकर ऐसी सांस्कृतिक छवि बनाती है जो भारत की आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक विरासत को नई ऊर्जा और प्रेरणा देती है।
रीवा में सुपारी से बनाई जाने वाली श्री गणेश जी की प्रतिमा प्रसिद्ध है। देश के एकमात्र जिले के रूप में यहाँ सुपारी से विभिन्न कलात्मक मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। रीवा के सुपारी कलाकारों को वर्ष 1993 में कला क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया।
भूमिसंरचना के समय ही प्रकृति ने विंध्य के पत्थर और रीवा जिलें में चचाई सहित जलप्रपातों का उद्भव किया। महाभारत महाकाव्य, रामायण सहित पुराणों में पंडित इलाहाबादी नेहरू सहित कई विद्वानों ने प्राकृतिक धरोहरों की महत्ता बताई है। चचाई जलप्रपात प्रदेश का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है।
पुरवा जलप्रपात रीवा ज़िले का एक प्रसिद्ध प्राकृतिक पर्यटन स्थल है। यह झरना टोंस (तमसा) नदी के पठार से नीचे गिरने से बनता है, जिससे लगभग 70 मीटर ऊँचाई से गिरता हुआ जल एक मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करता है। चारों ओर फैले हरियाली से घिरे चट्टानी क्षेत्र इस झरने की सुंदरता को और बढ़ाते हैं। तमसा नदी का उल्लेख रामायण में भी मिलता है, जिससे इस स्थान का धार्मिक महत्व भी जुड़ा हुआ है। रीवा शहर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित यह झरना प्राकृतिक सौंदर्य प्रेमियों, फोटोग्राफरों और शांति की तलाश करने वाले पर्यटकों के लिए एक आदर्श स्थल है।
बैजु धर्मशाला रीवा शहर का एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक ठहरने का स्थल है। यह धर्मशाला यात्रियों और तीर्थयात्रियों के लिए सुलभ एवं किफायती आवास सुविधा प्रदान करती है। यहां स्वच्छ कमरे, बुनियादी सुविधाएँ और शांत वातावरण उपलब्ध है, जिससे यह स्थानीय तथा बाहरी पर्यटकों दोनों के लिए उपयुक्त स्थान बनता है। रीवा बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी बहुत कम है, जिससे यह आसानी से पहुँच योग्य है। धर्मशाला का उद्देश्य सामाजिक सेवा और यात्रियों को आरामदायक ठहराव उपलब्ध कराना है।
देउर-कोठार मध्य प्रदेश के रीवा ज़िले में स्थित एक प्राचीन बौद्ध स्थल है। यहाँ तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के कई ईंटों से बने बौद्ध स्तूप पाए गए हैं। यह स्थल सम्राट अशोक के समय से संबंधित माना जाता है और बौद्ध धर्म के प्रसार के महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करता है। यहाँ खुदाई के दौरान पत्थर के स्तंभ, बुद्ध प्रतिमाएँ और ब्राह्मी लिपि में अभिलेख भी मिले हैं। देउर-कोठार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है।
रीवा की देन विश्व धारोहर -सफेद बाघ, (Panthera tigris tigris) की एक दुर्लभ प्रजाति है, जो अपनी सफेद फर और काली धारियों के कारण बहुत आकर्षक दिखाई देती है। यह सामान्य बाघों की तरह ही प्रजाति का हिस्सा होता है, लेकिन इसके रंग में बदलाव एक आनुवंशिक परिवर्तन (genetic mutation) के कारण होता है, जिसे “recessive gene” कहा जाता है।
बीहर नदी मध्य प्रदेश की एक महत्वपूर्ण स्थानीय नदी है, जो रीवा क्षेत्र के प्रमुख जलस्रोतों में से एक है। यह नदी वर्षभर आसपास के गाँवों और कृषि भूमि को जल प्रदान करती है। इसका जल रीवा के प्राकृतिक पर्यावरण और कृषि जीवन का अभिन्न हिस्सा है। बीहर नदी का प्रवाह मार्ग चट्टानी और हरियाली से घिरे क्षेत्रों से होकर गुजरता है, जिससे यह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर दिखाई देती है। मानसून के समय इसका जलस्तर बढ़ जाता है, और यह नदी छोटे-छोटे झरनों व धाराओं का रूप ले लेती है।
मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित मैहर माता मंदिर त्रिकूट पर्वत की चोटी पर विराजमान है। यह मंदिर माँ शारदा देवी को समर्पित है, जिन्हें विद्या और ज्ञान की देवी माना जाता है। यहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग 1,063 सीढ़ियाँ हैं, साथ ही रोपवे सुविधा भी उपलब्ध है। मान्यता है कि सती का हार यहाँ गिरा था, जिससे इसका नाम “मैहर” पड़ा। नवरात्रि के समय यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
अमरकंटक, जिसे “तीर्थराज” कहा जाता है, मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित एक प्रसिद्ध धार्मिक और प्राकृतिक स्थल है। यह वह स्थान है जहाँ से नर्मदा, सोन, और जोहिला नदियों का उद्गम होता है। यहाँ स्थित नर्मदा उद्गम मंदिर, कपिल धारा, और दुधधारा जलप्रपात विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा अमरकंटक धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
मध्य प्रदेश के रीवा जिले के गुर्ह क्षेत्र में स्थित भैरव बाबा की विशाल प्रतिमा श्रद्धा और आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। लगभग 35 फुट ऊँची यह प्रतिमा भगवान शिव के भैरव स्वरूप को समर्पित है। माना जाता है कि यह प्रतिमा एक ही पत्थर से तराशी गई है, जो इसकी विशेषता है। दूर-दूर से भक्त यहाँ दर्शन के लिए आते हैं, और इसकी भव्यता मन को श्रद्धा से भर देती है।
मध्यप्रदेश की गौरवशाली शिक्षण संस्था, सैनिक स्कूल रीवा, जहाँ अनुशासन, नेतृत्व और देशभक्ति के मूल्यों के साथ भावी सैनिकों एवं जिम्मेदार नागरिकों का निर्माण किया जाता है। यह विद्यालय छात्रों को शैक्षणिक उत्कृष्टता, शारीरिक प्रशिक्षण और नैतिक संस्कारों के माध्यम से भारतीय सशस्त्र बलों एवं जीवन के हर क्षेत्र के लिए तैयार करता है।
विंध्य भवन का हॉल परंपरा, गरिमा और सुविधा का सुंदर संगम है। यह हॉल कार्यक्रम, नृत्य–संगीत, नाट्य मंचन एवं सामाजिक आयोजनों के लिए उपयुक्त रूप से डिज़ाइन किया गया है। विशाल, सुव्यवस्थित एवं शांत वातावरण वाला यह हॉल आधुनिक सुविधाओं के साथ भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को प्रतिबिंबित करता है, जिससे हर आयोजन यादगार बनता है।
