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विंध्य की परंपरा और संस्कारों का संवर्धन

विन्ध्यांचल की आध्यात्मिक विभूति
पूज्य स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज
वि न्ध्य धरोहर विश्वविख्यात पूज्य संत रामभद्राचार्य जी का जन्म 14 जनवरी 1950 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में हुआ। दो माह की उम्र में ही स्वामी जी की ट्रेकोमा नाम की बीमारी से आँखों की रौशनी चली गई थी। स्वामीजी की प्रारंभिक शिक्षा उनके दादाजी के द्वारा हुई। 5 वर्ष की आयु में उन्होंने 10 दिनों के अन्दर केवल सुनकर 700 छन्दों की संपूर्ण वेदांत गीता कंठस्थ कर ली थी। 7 वर्ष की अल्पायु में सम्पूर्ण रामायण एवं आगामी कुछ वर्षों में ही 4 वेदों , 6 शास्त्र , 18 पुराण , उपनिषद , संस्कृत व्याकरण आदि ग्रंथों को सुनकर कंठस्थ कर लिया। औपचारिक शिक्षा के लिये जौनपुर जिले के निकट एक गाँव में संस्कृत , हिंदी , गणित , इतिहास आदि विषयों की शिक्षा उपरांत आदर्श गौरीशंकर संस्कृत महाविद्यालय में दाखिला लिया। केवल सुनकर याद रखने की क्षमता के कारण स्वामीजी लगातार अपनी कक्षा में सर्वश्रेष्ठ रहे ।
1971 में वाराणसी के सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री एवं आचार्य की डिग्री एवं 1981 में 31 वर्ष की आयु में पी.एचडी. की उपाधि प्राप्त की। आल इंडिया संस्कृत कांफरेस की प्रतियोगिता में स्वामीजी को 8 में से 5 गोल्ड मेडल प्राप्त हुए थे। 1987 में भगवान श्रीराम की तपोस्थली चित्रकूट में तुलसी पीठ की स्थापना की एवं यहीं से उनका नाम पं. गिरधर मिश्र के स्थान पर जगतगुरु स्वामी रामभद्राचार्य पड़ गया। वर्ष 2001 में दिव्यांग विश्वविद्यालय की स्थापना की , यह विश्वविद्यालय दुनिया का पहला दिव्यांग विश्वविद्यालय है। स्वामीजी इसके आजीवन कुलाधिपति है।
न्यायालय में रामजन्म भूमि के शास्त्रीय साक्ष्य - रामजन्मभूमि के मामले में स्वामीजी ने 441 साक्ष्य प्रस्तुत किये , जिसे न्यायालय द्वारा स्वीकार किया गया। स्वामीजी ने अथर्व वेद के दशम काण्ड के 81 वें अनुवाक्य के दूसरे वाक्य से भी प्रमाण उपलब्ध कराये थे।
वर्ष 1961 में स्वामीजी को अयोध्या के पंडित श्री ईश्वरदास महाराज से उपनयन संस्कार के समय गायत्री मंत्र के साथ राम मंत्र की दीक्षा प्राप्त हुई एवं नवम्बर 1983 के कार्तिक पूर्णिमा के दिन रामानंद संप्रदाय में विखत की दीक्षा ली।
संयुक्त राष्ट्र को संबोधन - वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित सहस्त्राब्दि विश्व शांति शिखर सम्मेलन में भाग लेकर ' भारत ' और ' हिन्दू ' शब्दों की व्याख्या के साथ ईश्वर के सगुण निर्गुण स्वरूपों के उल्लेखों के साथ वक्तव्य दिया।
स्वामी जी अब तक 230 से ज्यादा धार्मिक पुस्तके एवं 60 से ज्यादा साहित्य की रचना कर चुके हैं। उन्होंने हिंदू धर्म व विश्व शांति हेतु लगभग पूरे विश्व में धार्मिक प्रचार यात्राएँ की हैं। स्वामी जी को हिंदी साहित्य व्याकरण एवं हिंदी भाषा के गौरव की रक्षा के लिए सम्मानित किया गया। अखिल भारतीय हिंदी सम्मेलन भागलपुर , बिहार में महाकवि की उपाधि तथा 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा साहित्य अकादमी पुरूस्कार द्वारा सम्मानित किया गया। 2011 में पूज्य संत मुरारी बापू द्वारा तुलसी अवार्ड से सम्मानित किया गया। 2015 में उन्हें यश भारती का सम्मान दिया गया। उसी समय भारत का सर्वोच्च द्वितीय नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। स्वामी जी 22 भाषाएँ बोलते है। सैकड़ों राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित हो चुके है।
स्वामी जी के श्री चरणों में आस्था रुपी पुष्प अर्पण कर उन्हें शत्-शत् प्रणाम ।