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बंगाल टाइगर सफेद बाघ
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विंध्य सांस्कृतिक मंच

विंध्य की परंपरा और संस्कारों का संवर्धन

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      विन्ध्यांचल की आध्यात्मिक विभूति 

 

                   परम तपस्वी संत बाबा कल्याणदास जी 

 

भारतीय संत परंपरा न केवल देश वरन पूरे विश्व की चिंतन धारा को मेरुदंड प्रदान किया है। सनातन प्रेमी भारतीयों के लिए यह गौरव का विषय है कि वैदिक प्राचीन काल से लेकर अर्वाचीन काल तक भारत की संत परंपरा अक्षुण्ण है। आज की युवा पीढ़ी जिनका जीवन उथल-पुथल से भरा है उनमें भी इस देश की तपः संत महात्माओं की परंपरा विद्यमान है। इस गौरवशाली परंपरा में उदासीन संप्रदाय के संत शिरोमणी के रूप में परम तपस्वी बाबा कल्याणदास जी का नाम अग्रणी है। 

 

पूज्य बाबाजी के व्यक्तित्व की विराटता का ओर-छोर नहीं है और उनकी गहराई अथाह है। उनके व्यक्तित्व में दिव्यता और भव्यता जटिल साधना से प्राप्त हुई है। बाबाजी की महानता को समझने का प्रयास हम महान संतों के श्रीमुख से उनके प्रति श्रद्धा भारित उद्‌गार और मधुर भावनाओं से कर सकते हैं। 

 

उतरांचल के अल्मोड़ा जिले के एक छोटे से गाँव के एक पुण्यवान ब्राह्मण परिवार में बाबा जी का जन्म हुआ। उनके पिता के बड़े भाई ने उनको दत्तक पुत्र के रूप में गोद ले लिया था। बाबाजी ने नौ साल की बाल अवस्था में घर छोड़कर ईश्वर प्राप्ति का मार्ग चुना और वे घने जंगलों में प्रभु की आराधना में लग गये। ऋषिकेश में उनकी मुलाकात उनके गुरु परमहंस स्वरूप दास जी से हुई। जिन्होंने उन्हें उदासीन सम्प्रदाय एवं संन्यास की दीक्षा दी। 

 

बाबाजी नेपाल उड़ीसा और मध्य प्रदेश के अमरकंटक में कई वर्षों तक कठिन तपस्या में लीन रहें। उन्होंने माँ नर्मदा की परिक्रमा पूरी कर माँ की अनुमति से ही नर्मदा किनारे अपना आश्रम बनाया। माँ नर्मदा की यात्रा से बाबाजी को जिन कठिनाइयों का साक्षात्कार जनित अनुभव आश्रम के अस्तित्व में आने के बाद परिक्रमा वासियों को बड़ी सुविधा प्राप्त हुई। बाबा जी को अपने जीवन काल में कई बार देवी दर्शन की अनुभूति हुई। माँ नर्मदा उनको स्वप्न में प्रेरणा देतीं रहीं और बाबा जी का माँ नर्मदा से भावनात्मक लगाव बढ़ता गया। 

 

बाबा जी अद्वैतवाद और सर्व धर्म संभाव के सशक्त समर्थक हैं। उनके उपदेश सरल और व्यावहारिक हैं इस कारण बाबा जी की शिक्षाएं भारत के साथ-साथ विदेशों में भी बहुत प्रसिद्ध हो गयीं हैं। समाज के दीन-हीन के प्रति गहरी करुणा रखने वाले बाबा जी ने वन-वासियों और जन-जातियों के लिए धर्मार्थ औषधालय की स्थापना की। वे वनवासियों के बीच बहुत प्रिय हैं। 

 

अमरकंटक में कल्याण सेवा आश्रम एवं डोल अल्मोड़ा में कल्याणिका हिमालय देवस्थानम् के साथ-साथ बाबा जी के प्रयासों के द्वारा दो आवसीय अंग्रेजी माध्यम विद्यालय पूरे देश से आये विद्यार्थियों को संस्कारयुक्त शिक्षा प्रदान कर रहें हैं। बाबा जी द्वारा स्थापित अस्पताल जरुरतमंदों और वंचितों की सच्ची सेवा कर रहा है। अध्यात्मिक साधना के साथ शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में किये गये कार्यों से भी बाबा जी ने अपने गुरु चरणानुरागियों पर असीम कृपा की है। 

 

बाबा जी के श्री चरणों में आस्था रुपी पुष्प अर्पण कर उन्हें शत्-शत् प्रणाम।