Panthera tigris tigris
विंध्य की परंपरा और संस्कारों का संवर्धन

गीतेन्द्र प्रताप सिंह भरतशरण सिंह परिहार
एक बार पुनः विन्ध्यिका 2025 के अंक के साथ हम आपके समक्ष उपस्थित है। हमारी सदैव इच्छा रहती आयी कि नियमित रूप से विन्ध्यिका का प्रकाशन हो , तथापि अपरिहार्य कारणों से यदा-कदा विलम्बा होता रहा।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हम सभी यह जानते है कि लोगों में पढ़ने-पढ़ाने की रूचि कम हो रही है। नियमित रूप से प्रकाशित होने वाली अनेक पत्र-पत्रिकायें अब विलुप्त होती जा रही है , ऐसे में पत्रिका का प्रकाशन हमारा साहस भरा कदम कहा जावेगा। निरंतरता में न सही हम यह प्रयास करते ही रहे। सीमित क्षेत्र में हमारे इस प्रयास को सराहना भी मिलती रही है और प्रतीक्षा भी रहती आयी। यह सब इसलिये संभव हो पाता है क्योंकि विन्ध्यिका के रचनाकारों एवं सुधी पाठको के आत्मीय सूत्र में हम बंधे हैं।
' विन्ध्यिका ' में हमारा प्रयास विन्ध्य क्षेत्र के स्थापित , तथा साथ ही नवोदित रचनाकारों को सामने लाने का होता है। उनके माध्यम से विन्ध्य के समकालीन सृजन के साथ विन्ध्य की कला , सांस्कृति और पुरातत्व को सामने लाने का हमारा संकल्प होता है। हमारा यह भी प्रयास होता है कि विन्ध्य के लोकजीवन , लोकभाषा तथा लोकभोजन जिनके बारे मे में जानकारी विलुप्त होती जा रही है , अपने सुधी पाठको को परिचित करायें।
विन्ध्य क्षेत्र के कुछ मूर्धन्य रचनाकारों का देवलोक गमन हो गया हैं। प्रथम श्री देवीशरण गामीण जी , जो विन्ध्य में प्रगतिशील आंदोलन की प्रथम पंक्ति के ध्वजवाहकों में रहे है। दूसरी विभूति रहे हैं सतना के अप्रतिम गीतकार डॉ. सुमेर सिंह शैलेश जिन्हें साहित्य जगत में ' गीतर्षि ' के नाम से जाना जाता था। वे न केवल विन्ध्य क्षेत्र के लोकप्रिय कवि थे वरन् सारे देश मे उनकी प्रसिद्धि मंच के रससिद्ध कवि के रूप में थी। तीसरे विभूति रीवा जिले के हरदी गांव में जन्मे श्री कलिका त्रिपाठी , राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे। उनका सृजन संसार हिंदी के साथ-साथ बघेली में भी उतना भी व्यापक था। गीतों-गजलों के अतिरिक्त श्री कालिका जी बहुत अच्छे कहानीकार भी थे। यह रचनाकार अब हमारे मध्य नही है। उन्हें श्रद्धांजिल स्वरूप उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के बारे में परिचित कराने हम इस अंक में विशेष सामग्री दे रहे हैं। विन्ध्य परिवार की ओर से हम विन्ध्य क्षेत्र के मूर्धन्य रचनाकारों को नमन करते हुये अपनी श्रद्धांजलि व्यक्त करते है।
गत वर्ष 2024 में विन्ध्य क्षेत्र को एक और सम्मान प्राप्त हुआ , जिसके लिये हम सब विन्ध्यवासी गौरवान्वित अनुभव करते है। विन्ध्य की माटी के दो सपूतों को थलसेना एवं नौसेना के सर्वोच्च पद पर अलंकृत किया गया। रीवा जिले की नई गढ़ी तहसील (अब नवीन घोषित जिले मऊगंज के अंतर्गत) के गांव मुढ़िला में जन्में श्री उपेन्द्र द्विवेदी को भारतीय थलसेना का अध्यक्ष एवं सतना जिले की अमरपाटन तहसील में जन्में श्री दिनेश कुमार त्रिपाठी को नौसेना का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। एक साथ एक ही समयकाल में उनकी सफलता सभी विंध्य वासियों के लिये सम्मान का विषय है। विन्ध्यिका के इस अंक में विन्ध्य के इन सपूतों के व्यक्तिव एवं कृतित्व से संबंधित सामग्री संयोजित करने का प्रयास किया है एवं विन्ध्यिका के मुख्य पृष्ठ पर इनके चित्रों के माध्यम से हम इन्हें आदरांजलि देते है।
विन्ध्यिका में सदैव हमारा प्रयास पुरातन को प्रकाश में लाने एवं नवीन को समुचित स्थान प्रदाय करने का रहता आया है। हमारे इस प्रयास को विंध्य के स्थापित रचनाकारों के साथ नवोदित रचनाकारों का अहैतुक/स्नेह प्राप्त होता रहा है। उनके स्नेह एवं सहयोग के बल पर ही हम विन्ध्यिका का प्रकाशन कर पाने में समर्थ होते हैं। हम उन सभी रचनाकारों का हृदय से आभार व्यक्त करते है। रचनाओं के संकलन में हमारे साथी श्री दिनेश प्रताप सिंह के लिये भी उनका आभार प्रकट करते है। पत्रिका में सम्मिलित रचनाओं में व्यक्त विचार एवं दिये गये तथ्य लेखकों के अपने हैं , इस संबन्ध में पत्रिका किसी प्रकार उत्तरदायित्व नहीं लेती है। विन्ध्यिका को और अधिक उत्कृष्ट बनाने के लिये सभी लेखक बंधुओं एवं पाठको से सहयोग एवं परामर्श की कामना के साथ।